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Tuesday, November 26, 2019

देवी



देवी, बुरा ना मानना,
अगर मैं कहूँ तुम्ही मेरी कहानी हो,
तुम्ही मेरे जीवन की रवानी हो,
मेरे लिए तुम्ही हवा धुप और पानी हो,
इससे आगे और क्या कहूँ -
तुम्ही मेरे जीवन की स्वामिनी हो।

देवी, क्षमा करना मुझे,
अगर बुरा लगा हो मैंने जो कहा,
अगर नहीं जानतीं, मैंने अब तक क्या क्या सहा,
अगर नहीं मानतीं, वही अपना है अपने लिए जिसका आंसू बहा है।
अगर यह मेरी मूर्खता है, मैं भावनाओं में जो बहा,
मैं खुश हूँ, मैं बुद्धिहीन जो रहा।

देवी, सोचना समझना फिर कभी,
आज कुछ जान लो मेरी व्यथा,
आज कहने दो मुझे अपनी कथा.
पैर नंगे कंकड़ों पर चलता रहा हूँ,
वस्त्र चीर चीर हैं कंटकों में उलझता रहा हूँ,
देह का आभास नहीं, आत्म रक्षण के लिए महकता रहा हूँ,
इन्ही बीहड़ों में चलते चलते,
जब से सोचा तुम्हें, अपना समझता रहा हूँ।

देवी, मैं भी कभी एक फूल था,
मुस्कराता, महकता चहकता एक जनून था,
देह में बहता हुआ तप्त खून था।
किन्तु काली कोई टकराई नहीं,
मेरे जोश में भरमाई नहीं,
मैं तरसता ही रहा अनजान था,
मुझे तुम्हारे ही मन में बसने का अरमान था।

देवी, युग बीत गए हैं तुम्हारी तलाश में,
किन्तु मेरा सूरज तो अभी उगा है,
सो रहा था बालपन जो अभी अभी जगा है।
कुछ तुम धरा के ऊपर उठो, कुछ मैं उतरूं आसमान से,
हाँ क्षितिज के रही नहीं, हम बादल बने हैं उफान से।
विश्व को नव संरचना दें, पारस्परिक प्रणाम से,
चलो साथ मेरे, इस प्रभात के सुर गान से। 

 

Wednesday, October 30, 2019

आ गए हम आपके गाँव में



लो आ गए हम आपके गाँव में, नदिया किनारे पेड़ की छाँव में।
आपकी शरण में हम आ गये हैं, स्वस्थ सार्थक कर्म की चाह में।

हमारे शहर में, पानी ही नहीं, हवा भी नहीं है।
जीवन ना सहज, पल-पल समस्या गहन हो रही है।   
गाँव के पशु वाहन आहीस्ता, मिलती शान्ति यहीं। 
स्त्री पुरुष परिश्रम करते हैं, हो पाती क्लान्ति नहीं।
किसान यहां हैं, मज़दूर भी है, नहीं कोई किसी के दांव में।
लो आ गए हम आपके गाँव में, नदिया किनारे पेड़ की छाँव में।

शहर में नहीं ज़मीं कहीं, आसमां भी नहीं होता।
सूख गया बचपन सारा, जोश जवानी है सोता।
गाँव गाँव घर का आँगन, ज़मीं आसमां का घर है।    
बच्चे अब भी हँसते हैं, युवा पसीने में तर हैं।
गाँव का जीवन, स्वतः संचालित, सागर लहरों पर बहती नाव में।
लो आ गए हम आपके गाँव में, नदिया किनारे पेड़ की छाँव में।

कृत्रिम होते गाल लाल,१४  चश्मा चमचम आँखों पर।
शहरी धरती पथरीली, चरण छमछम छालों पर।
गाँव की भूमि नरम धूल, ओस बिखेरे मोती है।
देह जब धूल धूसरित, चन्दन सुगंध होती है।
चलो छोड़ें शहर, बस जाएँ यहीं, चलन सामर्थ्य उगे पुनः पाँव में।
लो आ गए हम आपके गाँव में, नदिया किनारे पेड़ की छाँव में।

शहरी प्रभाव में  रूप मानव का हर क्षण बदल रहा।
कद में कमी उदार उदर, कपाल कुपोषित हो रहा।      
 मल मूत्र विसर्जन विलम्ब, पद चलन दूभर कर दिया।
चिन्तनशून्य मस्तिष्क ने, अर्थहीन शब्द कर दिया।
बौद्धिक प्रकाश में महामानव उगे, शेष रहें बौद्धिक छाँव में।
लो आ गए हम आपके गाँव में, नदिया किनारे पेड़ की छाँव में।
आपकी शरण में हम आ गये हैं, स्वस्थ सार्थक कर्म की चाह में।

Sunday, October 27, 2019

कर्मयोग



सांस का जो भोग है
निष्ठां इसका उपयोग है। 
लक्ष्य इसका निर्धारित है -
उच्च मानवी आराधना, कर्मयोग की साधना।

यदि कभी मैं भटक जाऊँ, 
संसार मोह में अटक जाऊँ। 
तुम मुझको याद दिला देना,
उच्च मानवी आराधना, कर्मयोग की साधना।

कर्म का विधान हो,
निष्ठां का वरदान हो। 
ज्ञानयोग इसकी आत्मा, 
उच्च मानवी आराधना, कर्मयोग की साधना।

ज्ञान केवल मार्ग है,
कर्म ही मुकाम है। 
परिणाम कुछ भी हो मगर, 
उच्च मानवी आराधना, कर्मयोग की साधना।

परिणाम बस परिधान है
जब ज्ञान प्रबल मान है। 
स्वयं जागृत हो जाती,
उच्च मानवी आराधना, कर्मयोग की साधना।

परिणाम यदि प्रतिकूल है
निष्ठां नहीं अनुकूल है। 
ध्यान का संकेन्द्रण,
उच्च मानवी आराधना, कर्मयोग की साधना। 

कर्म ही जीवन का प्राण है, 
इसकी गुणता परिणाम है। 
ध्यानयोग से सबल होती,
उच्च मानवी आराधना, कर्मयोग की साधना। 

ध्यानयोग का अर्थ यही, 
कोई अन्य  विचार नहीं। 
इसका ही प्रभाव है, 
उच्च मानवी आराधना, कर्मयोग की साधना ।

निज कर्म की धारणा, 
आत्म-विश्वास की उपासना
इसीलिये महान है,
उच्च मानवी आराधना, कर्मयोग की साधना।

गीता का उपदेश यह 
हृषिकेश द्वारा ज्ञान यह 
जो युद्ध क्षेत्र में दिया -
उच्च मानवी आराधना, कर्मयोग की साधना।

हरिष्केष विष्णु के पिता,
भारत के राजा निर्मिता। 
निष्काम कर्म उपदेश उनका
उच्च मानवी आराधना, कर्मयोग की साधना। 

गीता खलनायक कृष्ण,
हरी भी  छलिया भी कृष्ण,
उसने किया सदा विरोध,
उच्च मानवी आराधना, कर्मयोग की साधना। 

चांदनी बनी दुल्हन मेरी



ओस की छाँव में चाँदनी गाँव में, देख तुम्हें ठिठके हैं कदम।   
यौवन प्रहर में खुशबू शहर में, स्वस्तिक नामक आश्रम अपन।       

तुम गाँव की गोरी चाँद की छोरी, शांत प्रशांत निशीथ क्षण मैं।   
सूना था आँगन अब रुनझुन पायल, चिराग हो तुम अँधियारा मैं।  
चांदनी पटल पर मैंने गीत लिखा, उस अनुराग का तुम गहना।      
मेरा गीत अजर संगीत अमर, तुम इसको गुनगुनाती रहना।  
मधुवन का मोहक बंधन ऐसा, प्रसंग प्रेम का प्रवाह अनुपम।   
ओस की छाँव में चाँदनी गाँव में,  देख तुम्हें ठिठके हैं कदम। 
यौवन प्रहर में खुशबू शहर में,  स्वस्तिक नामक आश्रम अपन।    

चांदनी तन है खुशबू श्रृंगार, रुनझुन पायल खुद छनक उठी। 
देखकर नृत्य में खोई हो तुम, साथ देने बदरी मचल उठी।
वंशी में बसा सुरमय सुर उभरा, चकोर मस्त चंद्र दर्शन में।     
मदमय मयूर हुए मगन नृत्य में, मयूरी मचली आँगन में। 
सहर कैसे होगी इस रात्रि की, सूरज ने बनाया घर कंगन।      
ओस की छाँव में चाँदनी गाँव में, देख तुम्हें ठिठके हैं कदम। 
यौवन प्रहर में खुशबू शहर में, स्वस्तिक नामक आश्रम अपन।    

तन युगल मद से बोझिल हो चुके हैं, संवादों का अंत हुआ है।  
शब्द हमारे बस गए साँसों में, साँसों का भी विलय हुआ है। 
सन्नाटा भी शान्त हुआ है, चिर प्रतीक्षित प्रथम स्पर्श का क्षण।     
सुहाग चतुर्दशी को व्याकुल मैं, क्यों मिलन वेला बस एक क्षण।       
अब प्रकाश नित संवर्धित होगा, जब पुनः प्राप्त होगा यह चमन।       
ओस की छाँव में चाँदनी गाँव में, देख तुम्हें ठिठके हैं कदम। 
यौवन प्रहर में खुशबू शहर में, स्वस्तिक नामक आश्रम अपन।    


    

पाया कहीं नहीं भगवान्



पाया कहीं नहीं भगवान्, होगा धर्ममुक्त इंसान, 
यह रचना हो रही है। 

मानव बाहर से आँका,
उसका अंतर्मन झाँका।  
हर व्यक्ति विशुद्ध महान, 
पाया कहीं नहीं भगवान्, होगा धर्ममुक्त इंसान, 
यह रचना हो रही है। 

धर्म जो दिखाया जाता,
बचपन से सिखाया जाता।  
छल कपट की पहचान,   
पाया कहीं नहीं भगवान्, होगा धर्ममुक्त इंसान, 
यह रचना हो रही है। 

जन्म समय नास्तिक सच्चा,
पलने पर आस्तिक बच्चा।  
होता पालन में अज्ञान,
पाया कहीं नहीं भगवान्, होगा धर्ममुक्त इंसान, 
यह रचना हो रही है। 

मनुष्य के बस दो प्रकार,
मानव देने का साकार।   
दानव लेता रहता दान, 
पाया कहीं नहीं भगवान्, होगा धर्ममुक्त इंसान, 
यह रचना हो रही है।

भयंकर षड्यंत्र धर्म है,
मानव के प्रतिकूल कर्म है। 
भय उत्पत्ति इसकी शान, 
पाया कहीं नहीं भगवान्, होगा धर्ममुक्त इंसान, 
यह रचना हो रही है। 

धर्म से जो मुक्त हुआ,
पावन स्व से युक्त हुआ। 
हो गया मौलिक इंसान,
पाया कहीं नहीं भगवान्, होगा धर्ममुक्त इंसान,  
यह रचना हो रही है। 

धर्म राजनैतिक प्रदूषण,
दानव जाति का आभूषण।  
कर रहा शोषण आसान,  
पाया कहीं नहीं भगवान्, होगा धर्ममुक्त इंसान, 
यह रचना हो रही है। 
  

Saturday, October 26, 2019

नेताओं से बचे रहेंगे।



सरकार की हमें नहीं जरूरत, १८
इसके बिना हम अच्छे रहेंगे, १८ नेताओं से बचे रहेंगे। १४

जो तन मन से मेहनत करेगा, १८  
खाएगा पियेगा मौज करेगा। १९
जो मेहनत करने से बचेगा, १८
भूखा नंगा परेशान रहेगा। १९
अमर सिद्धांत यही खूबसूरत १८         
सरकार की हमें नहीं जरूरत,
इसके बिना हम अच्छे रहेंगे, नेताओं से बचे रहेंगे।

नेता अपनों को शिक्षा देते १७
शिक्षित होते वो अफसर बनते १८
अनपढ़ रहते, नेता बन जाते १७
नेता बनकर वे शासन करते १८    
इससे समझो शासन की कूबत १८
सरकार की हमें नहीं जरूरत,
इसके बिना हम अच्छे रहेंगे, नेताओं से बचे रहेंगे।

नेता खुद अय्याशी करते हैं, १८
हमसे परिश्रम करने को कहते, १८  
हमारा धन जेबों में भरकर, १७
हमको कंगाल बनाकर रखते। १८
इसी से हर समय जनता डूबत १८
सरकार की हमें नहीं जरूरत,
इसके बिना हम अच्छे रहेंगे, नेताओं से बचे रहेंगे।

हम सर्दी गर्मी दोनों सहते १८
अनुकूल ताप में नेता रहते हैं।   
जब पसीना हमारा बहता है   १८
नेता ख़ुशी अनुभव करते हैं १९
ऐसे नेता लगते बदसूरत १८
सरकार की हमें नहीं जरूरत,
इसके बिना हम अच्छे रहेंगे, नेताओं से बचे रहेंगे।

नेता काजू की रोटी खाते, १८ 
हमको रूखा टुकड़ा चलता। १८
वस्त्र हमारे हफ्ते में धुलते, १८
नेता पल पल पोषाक बदलता।  १८    
भारत के नेता ऐसे धूरत १९
सरकार की हमें नहीं जरूरत,
इसके बिना हम अच्छे रहेंगे, नेताओं से बचे रहेंगे।

सरकार हमको बहुत रुलाती १६
टैक्स लगा महंगाई बढ़ाती, १७
नेता सब कुछ मुफ्त पाते हैं १७
हमको टुकड़ों को भी तरसाती। १८
नेता जैसी सरकारी मूरत १८
सरकार की हमें नहीं जरूरत,
इसके बिना हम अच्छे रहेंगे, नेताओं से बचे रहेंगे। 

बिन सरकार हम शहर छोड़ेंगे
शुद्ध जलवायु के गाँव रहेंगे।
जरूरतें अपनी कम रखेंगे,
उनका खुद उत्पादन करेंगे।
बापू के ग्राम स्वराज की मूरत
सरकार की हमें नहीं जरूरत,
इसके बिना हम अच्छे रहेंगे, नेताओं से बचे रहेंगे।

बिजली सूरज से निःशुल्क लेंगे, 
पानी प्रकाश बिजली से लेंगे। १८  
यात्रा हम साइकिल से करेंगे, 
शारीरिक श्रम से स्वस्थ रहेंगे।
सब बच्चे होंगे गाँव सम्पूरक,
सरकार की हमें नहीं जरूरत,
इसके बिना हम अच्छे रहेंगे, नेताओं से बचे रहेंगे।  

गाँव में हम खेती बाड़ी करेंगे, १८  
खेतों में सब्जी अन्न उगेंगे।  १८  
अपने बगीचों से फल खाएंगे, १९
भोजन के हम विकल्प पाएंगे।   
स्वस्थ बनें प्रेरणा के पूरक।  २० 
सरकार की हमें नहीं जरूरत,
इसके बिना हम अच्छे रहेंगे, नेताओं से बचे रहेंगे।

घर घर बकरी मुर्गी पालेंगे, 
कुत्ते बिल्ली चूहे न तारेंगे। १८ 
बन्दर सूअर रोगों के मूल १८   
इनका पालन मानव की भूल १४
स्वस्थ रहेंगे परस्पर प्रतिपूरक,
सरकार की हमें नहीं जरूरत,
इसके बिना हम अच्छे रहेंगे, नेताओं से बचे रहेंगे।

ग्राम्य उत्पाद के उद्यम होंगे। २० 
गाँव गाँव खुद सक्षम होंगे। 
उद्योगों से रोज़गार मिलेगा, १८  
घर रहकर सबको काम मिलेगा। १८
गाँव की आज़ादी व्यक्ति परिपूरक 
सरकार की हमें नहीं जरूरत,
इसके बिना हम अच्छे रहेंगे, नेताओं से बचे रहेंगे।

Thursday, October 24, 2019

अनायास ही उंगली छू गई



अनायास ही उंगली छू गई 

हुई थीं सुबह में जो आँखें चार 
आँखों में भरा था प्यार बेशुमार,
संवाद भी कोई नहीं हुआ था 
किन्तु मैं उसका घर जानता था। 
अब जब ज़िन्दगी की दुपहरी गयी 
यों अनायास ही उंगली छू गई। 

ज़िन्दगी नीरस सिसक रही है 
पीड़ा मन में कसक रही है 
मुलाक़ात होती जो एक बार 
देखता रूबरू क्या है प्यार।
जब साहस किया तो रूह गई 
यों अनायास ही उंगली छू गई।   
  
यूँ कोई खास मक़सद नहीं था 
उठे कदम पहुंचा मैं वहीँ था। 
बीती सदी आधी, देखा मुझको 
याद आयी लक्ष्मण रेखा उसको।
वह भी मेरी तरह ही सहमी हुई, 
यों अनायास ही उंगली छू गई।   

उसके घर में मैं चुप बैठा रहा,
सोच रहा था मैं क्यों आया यहां। 
तभी दो हाथ मेरा स्वागत किये 
मुझसे जलपान का आग्रह लिये।
मेरे उठे हाथ नज़र झुकी रही 
यों अनायास ही उंगली छू गई।

यों तो कुछ विशेष नहीं घटा,
किन्तु मन में एक बवंडर उठा 
वह सहमी सी वहां से चली गई, 
चला आया मैं, आत्मा मर गई। 
जी तो रहा हूँ ज़िन्दगी चू गई 
यों अनायास ही उंगली छू गई। 

Tuesday, October 22, 2019

आओ चलो फिर लौट चलें




आओ चलो फिर लौट चलें, बीते दिन हमें बुलाते हैं.
उन प्रसंगों को युग बीता, फिर भी आज रुलाते हैं। 

पहली बार तुम्हें देखा जब, तब तुम एक किशोरी थीं  
एक दिन तुम होगी मेरी, प्रफुल्लित पोरी पोरी थी। 
गालों पर इठलाता लावण्य आँखें लज्जा से बोझिल 
तुम एक पुस्तक पढ़ रही थीं बेसुध सी थी कोकिल। 
शब्द मचलते ओठों पर, रिमझिम में पत्ते इतराते हैं 
आओ चलो फिर लौट चलें, बीते दिन हमें बुलाते हैं। 

एक दिन तुम मेरे घर आईं, मुझे देख शरमाई थीं 
मैं छुप बैठा था दूर कहीं, चाहत की चोरी छुपाई थी.
मन में था विश्वास अटल, पर तन मेरा घबराता था 
नयन बंध जाते डोरी से बस चोरी से मुस्काता था।
उन लम्हों के गीतों को  तन मन अब भी गाते हैं    . 
आओ चलो फिर लौट चलें, बीते दिन हमें बुलाते हैं।

तुम कॉलेज से घर आ रहीं थीं मैंने तुमको देखा था 
हर डाली पर फूल खिले थे मौसम भी रंगीला था। 
साहस जुटा कर कैसी हैं आप, मैंने तुमसे पूछा था,
अच्छी हूँ आप कैसे हैं, कुछ आकर्षण मुस्काया था.
प्रथम संवाद ऐसा मोहक जैसे सागर लहराते हैं।     
आओ चलो फिर लौट चलें, बीते दिन हमें बुलाते हैं।

समय आने पर हम दोनों जब शादी के अनुकूल हुए 
लेकिन पिताश्री के आदेश मेरे मन के प्रतिकूल हुए.
बहुत रोया था तन मन पर साहस नहीं जुटा पाया
तुम बध गयीं एक डोर से, खुद को मैंने लुटा पाया। 
आज भी अनुशासन के बंधन कांटे से चुभ जाते हैं.
आओ चलो फिर लौट चलें, बीते दिन हमें बुलाते हैं। 

कुछ दिन बाद पिताश्री ने मुझको बांधा बंधन में 
बिसराये वो गीत अधूरे, बन ना पाया चन्दन मैं।  
अपने अपने परिवारों में हम दोनों यौं व्यस्त हुए
संबंधों के चंगुल में, पावन मन के अंकुर पस्त हुए।
सूखा सारा जीवन है, पर वो लम्हे बहुत सताते हैं 
आओ चलो फिर लौट चलें, बीते दिन हमें बुलाते हैं।  
           

अदृश्य प्रेमिका



अदृश्य प्रेमिका 

मुझको लगता है हरदम, उसने मेरा नाम लिया है।

उसकी खुशबू मेरी हवा में है
उसकी सूरत मेरी दुआ में है
उसको कभी नहीं देखा न उसको कोई नाम दिया है
मुझको लगता है हरदम, उसने मेरा नाम लिया है।

वो चलती मेरे साथ में है
रास्ते की बरसात में है
बरसाती चादर ओढ़े चलते चलते आराम किया है  
मुझको लगता है हरदम, उसने मेरा नाम लिया है।

काली रात के अंधियारे में
कहा कान के गलियारे में
आओ चलो दूर चलें संसार का सागर पार किया है
मुझको लगता है हरदम, उसने मेरा नाम लिया है।

उसको भी कोई दुःख होगा,
दुखियारे के पास सुख होगा
दुःख के पथ पर चलते जाएँ ऐसा सपना देख लिया है
मुझको लगता है हरदम, उसने मेरा नाम लिया है।

दुखिया ने दुखिया को चुना 
दुःख दुःख का ताना बाना बुना
दुःख का कहीं क्षितिज होगा यह हमने मान लिया है
मुझको लगता है हरदम, उसने मेरा नाम लिया है।

उसका हाथ मेरे हाथ में है
हरदम रहती मेरे साथ में है
पर दिखाई नहीं देती अपना रूप ऐसा बाँध लिया है
मुझको लगता है हरदम, उसने मेरा नाम लिया है। 

चल निकला हूँ बिना डर के
उसके ऊपर विश्वास करके
अब कहीं भी ले जाए उसको साथी मान लिया है
मुझको लगता है हरदम, उसने मेरा नाम लिया है।

कौन है वो मैं नहीं जानता
सदा संग रहेगी यही मानता
दोनों के दुःख मिट जाएंगे ऐसा हमने जान लिया है
मुझको लगता है हरदम, उसने मेरा नाम लिया है। 

जो कुछ दिखाई नहीं देता
हमसे कुछ भी नहीं लेता
जो दिखलाई दे रहा उसका छल तो जान लिया है
मुझको लगता है हरदम, उसने मेरा नाम लिया है।

उसके पास बैठकर पूछा 
मेरा ही क्यों नाम सूझा
भीड़ भरे संसार में तुम को ही अकेला पा लिया है
मुझको लगता है हरदम, उसने मेरा नाम लिया है। 

Tuesday, October 15, 2019

आज मन उदास है।



काम में मन लगता नहीं, 
आज मन उदास है। 

उसकी परछाईं साथ रहती है 
कभी कभी आँखों से बहती है 
कभी दिखाई नहीं देती 
पर लगता आसपास है 
आज मन उदास है। 

परेशां हूँ खुद से 
ख्वाहिशों की ज़िद से 
यों लगता सब सकून है 
उबल रहा मेरा खून है
चला जाऊं खुद से दूर बहुत  
जहाँ उसके न होने की आस है 
आज मन उदास है। 

कभी जागा सा नहीं रहता 
सोता ही नहीं कैसे जगता 
आसान है कर्म से भागूं 
पर कैसे अपने मन से भागूं 
यहां मानव हताश है 
आज मन उदास है। 

एक दिन ऐसा भी था 
बिन मिले भी मिलना जैसा था 
मन बंधे थे एक डोर से 
भावी आशा के जोर से 
अब आशा ही निराश है 
आज मन उदास है। 

एक दिन अचानक मिल गया 
उसने जो पूछा हिल गया 
हम तुम क्यों दूर हुए 
इतने क्यों मजबूर हुए 
अब भी उत्तर का प्रयास है 
आज मन उदास है।   

Sunday, May 22, 2016

Tear, a Drop of Water from an Eye


A drop of water from an eye
Falling on a page spread like blank sky
Imprints poetry of the moment
Of sorrows and painful sentiment
It matters not whose eye is that vanity
It is the loss of an ocean for the whole humanity
In dire need of watery eyes for its expression
Of Soft humane feelings of love and affection
*
A drop of water staying in an eye
Might create poetic pulses of a loving pie
And all that human emotions could say
For happier life of readers and listeners gay
All around on the Earth full of rejoice
Desirable as the only human choice
*
A drop of water from an eye
Flowing down to the cheek and get dry
Imprints a sad emotion on the face
Sad feelings in mind of human race
On elimination of of water filled eyes
On elimination of emotional guys
On elimination of imprints of poetic pulses
Full of love and affection impulses
*
A drop of water staying in an eye
Might be the cause of joyous ride
Pleasing many others and wiping sorrows
From their faces in gloomy burrows
Thus seeding the humanity with joys
Making lives fragrant and colorful toys
*
A drop of water from an eye
Gets lost in soil like a grain of rye
Whenever a beast defeats a pious soul
By replacing tender love with wild lusty role
Whenever the beastly lust procreates
An army of beasts on the Earth at high rates
Making the mother Earth to weep
For pious souls defeated in the sweep
*
A drop of water staying in an eye
Might produce whispers of modest try
Making a screen for the humanity
To distinguish emotional humans in rarity
From lusty beasts in plenty
Making two distinct Worlds on the Earth
Of beastly lust and humane worth
For saving tender loving souls
From onslaughts of lusty doles

***

Thursday, April 28, 2016

You, in my Mind



For your love, my Darling! I always long
See you very rare, still, you're my song
To me, you have always been very kind
Am grateful to you for being in my mind

You get busy in your work or with friends
In social obligations, or in modern trends
Whatever you do, as your routine grind
Am grateful to you for being in my mind

Never bother for me of any importance
How you treat me in your performance
Would continue to keep my love as blind
Am grateful to you for being in my mind

Whether I feel lonesome or as desolate
Don't think, my dear, would ever isolate  
You have always been my precious find
Am grateful to you for being in my mind

I'll keep on waiting for you until my end
When I am gone, find me in your rand
So long, I love you, I consider you kind
Am grateful to you for being in my mind

You just say 'I love you', you mean or not
Won't complain, you may throw me to rot
My love is a fool's paradise, you may find
Am grateful to you for being in my mind

You are free to love me or anybody else
Keep on writing on you in poetic impulse
My poems are pulses of loving you blind
Am grateful to you for being in my mind

Sunday, April 3, 2016

A Random Introspection

The way things are moving around
After my passion for poetry was found
About 15 days back, I am amazed
Feel like an air balloon flying high
Still stringed to ground raised !

Lot of children coming to find flowers
In my garden, I am generous about
Many new friends made
Many friendships intensified en-route
Often laugh loud on the present
Smile for future something bright
Yet unknown, about relationships
From faraway quarters I dream
Though nothing known, nothing in sight !

Today evening after a likable meal
Slept for an hour on inner demand
Heavy preparations were going on
For my marriage ceremony grand
Huge gathering of friends and relationships
Busy everybody fondly excited
Combing my hairs after a bath
Worried to find my silver hairs
Stopped from combing leaving to
Hair dresser on attendance
Decorative structures being erected
Around home for the ceremony
Everywhere joys in abundance !
Laughter burst out about the dream
On waking up, got busy with thoughts on
Why such a dream, no justification found
Still feel - written something boldly
On the canvas that dream only found !

The way I'm feeling relaxed now a days
Is unprecedented, unlike my natural ways
For my assurance to the self -
Have enough time for everything I may wish
No worry, no hurry, nothing is going to perish
This is not passivity, working 12 hours a day
Whole day, pleasure and gay, hopeful way
Not complacency, nothing allowed to happen
But designed, made efforts to put on tray !

Anger, a trait I liked, is disappeared

Problems and immoralities around
I used to complain about feeling strife
Don't trouble me now
Viewed as minor issues for my larger life
Everything is not going to my liking
Feel confident on my strength

What stays is right, what goes away is wrong
An external balance is going to establish
With my own strengths and glam
Hence, I need nothing else to do
Except being strong in everything I am !

Feel, things are going to burst some day
Explosion - from within outward,
Also implosion - from outside to inward
Both forming an aura around
Of colorful glitters and shines
Bathing me with bliss non-hazard !

Thursday, March 24, 2016

How Painful, It Is to Love



How Painful, It is to Love
A worker toils the whole day for making their two ends meet
At the end of the day
Body exhausted, flowed out all the sweat
Finds none to see the work and pay
Goes back home empty handed, nothing to say
To their empty belly, adds few sips of water
Which hurts, rather than eliminating the hunger
You may say 'sorry' to them and laugh out the matter
But it hurts me, leaving me scatter
For I know how much painful it is
For a lamp to burn waiting without hope fuel
Like trying to satisfy the hunger with water cruel
Because I am the worker who toiled
Craving in the dark night, how I coiled!
*
A poet dries up their blood shedding tears
Whole night to empower poetic words, evading fears
Morning arrives with full composition of morrow
Finds the World too lusty to listen to the poem of sorrow
What to do of the poem, and the emotions expressed
Composition valueless today, in future would it be assessed
The words made of blood bite them back, like dogs hound
You may say 'sorry' to them, and laugh the matter out
But it hurts me like spreading darkness, switching off light
For I know how painful it is to write the whole night
And find the World illiterate to the poetic words tried
Because I am the Poet who composed
Reverberating words, dark night, how I silently cried!
*
A lover waits for their beloved
Whole night feeling bluffed
Brute Sun arises with emptiness all around
Disappears the hope of arrival of the beloved
Wonders why they are there, what may be their role
Weeps in loneliness, none to tap shoulder to console
Lover's life lost in waiting, not even a shout
You may say 'sorry' to them, and laugh the matter out
But it hurts me like taking away somebody's birtright
For I know how painful it is to wait for the whole night
And find the beloved having nothing to realize
Because I am the lover who waited
Streaming tears, blank life, how I capsize!

***
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